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हिटलरितन्त्र

HITLAR-POEM सच को छुपाते है फिर भी मुस्कुराते है हम भी सब जानते है पूरा सच पहचानते है कब तक सच छुपाओगे एक दिन रँगे हाथो पकड़े जाओगे ...
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सियासत

सियासत गरीब है धर्म के बहुत करीब है जनता को बहकाती है रोज हत्याएं करके सो जाती है रोजगार माँगना अब ग़ुनाह हो गया है सही को मत पहचान...
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नकाब

यहाँ चेहरों पर है नकाब सभी के सभी ने छुपाया है खुद को सभी से कहने को कहते है अपने हो तुम तो फिर क्यों नही बतलाते बहुत कुछ उसे से? ...
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